Russia-Ukraine War: इसलिए NATO से चिढ़ता है रूस, 70 साल पुरानी है दुश्मनी

Russia Ukraine war why Vladimir Putin hates Nato military comparison Russia vs Nato: रूस (Russia) और यूक्रेन (Ukraine) की जंग किसी भी वक्त शुरू हो सकती है. इसी बीच आपको बता दें कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Putin) ने पूर्वी यूक्रेन के डोनेत्स्क और लुहंस्क को एक नए देश के रूप में मान्यता दे दी है. साथ ही पुतिन ने इन नए देशों में अपनी सेना भी भेज दी है. तो वहीं यूरोपीय देश इस बात की आशंका जता रहा है कि इन तरीकों से ही रूस यूक्रेन पर हमले की तैयारी कर रहा है.

दोनों देशों के बीच की लड़ाई की वजह NATO माना जा रहा है. NATO का अर्थ है कि नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन. इसकी शुरूआत साल 1949 में करी गई थी. तभी से ही यूक्रेन NATO का हिस्सा बनना चाहता था मगर रूस को ये बात नहीं पचती है.

क्योंकि पुतिन के रूस (Russia) को लगता है कि यूक्रेन (Ukraine) NATO में शामिल हो गया तो फिर NATO देश की सेना और ठिकाने रूस (Russia) की सीमा के पास आकर बैठ जाएंगे. जिससे ये सवाल उठता है कि आखिर रूस NATO से इतना चिढ़ता क्यों है? तो ये बात आपको समझने के लिए पहले NATO को समझना चाहिए.

गौरलतब है कि साल 1939 और 1945 के मध्य में ही दूसरा विश्व युद्ध हुआ था. इस युद्ध के बाद ही सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप से अपनी सेनाएं हटाने से मना कर दिया था. इतना ही नहीं साल 1948 आते-आते उन्होंने बर्लिन को भी अपने कब्जे में कर लिया था. जिसके बाद अमेरिका फ्रंट फुट पर आया था. सोवियत संघ की इन्हीं हरकतों पर रोक लगाने के लिए अमेरिका ने साल 1949 में NATO की शुरुआत की थी. जब NATO की शुरुआत हुई थी तो इसमें कुल 12 देश थे. अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, इटली, नीदरलैंड, आइसलैंड, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, नॉर्वे, पुर्तगाल और डेनमार्क शामिल हैं. मगर आज NATO में कुल 30 देश हैं.

आम शब्दों में कहा जाए तो NATO एक सैन्य गठबंधन है. NATO सुरक्षा नीति पर काम करता है. ऐसे में अगर कोई बाहरी देश किसी भी एक NATO में शामिल देश पर हमला करता है. तो ऐसे में इसे सिर्फ एक देश ही नहीं बल्कि पूरे NATO पर हमला माना जाएगा. जिस वजह से NATO में शामिल सारे देश उस देश की मदद करने के लिए आगे आएंगे.

रूस क्यों चिढ़ता NATO से?

दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया दो हिस्सों में बट गई थी. युद्ध के बाद दो देश सुपर पॉवर बन गए थे. एक ओर था अमेरिका तो दूसरी तरफ सोवियत संघ. मगर साल 1991 को दिसंबर में सोवितय संघ टूट गया. जिसके बाद इसे 15 नए देशों में तब्दील कर दिया गया था. आर्मीनिया, अजरबैजान, बेलारूस, इस्टोनिया, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, कीर्गिस्तान, लातविया, लिथुआनिया, मालदोवा, रूस, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन और उज्बेकिस्तान.

जब सोवियत संघ टूट गया तो जहां पहले दो सुपर पॉवर थे वहां अमेरिका अब अकेला बचा. जिस वजह से ही अमेरिका NATO का दायरा बढ़ाता चला गया. सोवियत संध से टूटकर अलग देश बने भी NATO के सदस्य बनने लगे. साल 2004 आते-आते इस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया NATO में शामिल हो गए.

साल 2008 में यूक्रेन समेत जॉर्जिया को भी NATO का न्यौता भेजा गया. मगर कुछ कारणों से ये NATO का हिस्सा नहीं बन पाए.

इन्हीं सबके चलते रूस के प्रेसिडेंट पुतिन ने NATO के फैलाव को लेकर अपना गुस्सा और आपत्ति दोनों जताई थी. एक इंटरव्यू के दौरान पुतिन ने कहा था कि…रूस मे पहले भी कहा है कि पूरब में NATO का फैलाव मंजूर नहीं किया जाएगा. अमेरिका हमारे दरवाजे पर मिसाइलों के साथ नहीं खड़ा हो सकता है. अगर हम भी कनाडा और मैक्सिको की सीमा पर अपनी मिसाइलें खड़ी कर दें तो अमेरिका क्या इस बात की मंजूरी देगा?

कुछ पुराने दास्तावेज हालांकि ये बात बताते हैं कि एक वक्त था. जब पुतिन खुद रूस को NATO का सदस्य बनाना चाहते थे. मगर अब पुतिन NATO से चिढ़ते हैं. आपको बता दें कि रूस की सीमा से सटे इस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया और तुर्की NATO के सदस्य हैं. ऐसे में रूस अब अगर यूक्रेन को भी NATO से जुड़ने देता है तो रूस पूरी तरह से घिर जाएगा और इस बात के लिए पुतिन बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं.

रूस और NATO में कौन ज्यादा ताकतवर?

अगर युद्ध के हिसाब से देखा जाए तो रूस और NATO की कोई तुलना नहीं हो सकती है. क्योंकि अगर NATO के 30 देश एकसाथ आते हैं तो उनके पास 33 लाख से ज्यादा जवान हैं. जबकि रूस के पास सिर्फ 12 लाख की सेना है वो भी सिर्फ 8 लाख जवान सक्रिय है. NATO हर साल 1106 अरब खर्च डॉलर करता है अपनी सेना पर तो वहीं रुस सिर्फ 62 अरब डॉलर.

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